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गुणायतन
आत्म विकास का दिव्य सदन
जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है. -
गुणायतन
आत्म विकास का दिव्य सदन
जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है.
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जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है.
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जैन दर्शन में आत्मशक्तियों के विकास अथवा आत्मा से परमात्मा बनने की शिखर यात्रा के क्रमिक सोपानों को चौदह गुणस्थानों द्वारा बहुत सुंदर ढंग से विवेचित किया गया है.

प्रथम तल मंडोवर
जिनालय की बाहरी दीवार जिसे मंडोवर कहा जाता है, की प्रथम पंक्ति में शक्ति के प्रतीक हाथी दिखाए गए हैं। गजराज के ऊपर इंद्र-इंद्राणी प्रसन्न मुद्रा में जोड़े के साथ जिनालय की ओर जाते हुए दिखाए गए हैं। द्वितीय पंक्ति में बेल अंकित की गई है, जो कि प्रगति के प्रतीक के रूप में है। तृतीय पंक्ति में पुष्प हैं, जो कि प्रसन्नता की अभिव्यक्ति करता है। चतुर्थ पंक्ति में इन्द्र अलग-अलग मुद्राओं में दिखाए गए हैं।

६४ ऋद्धि के प्रतीक ६४ स्तंभ
६४ ऋद्धि के प्रतीक ६४ स्तंभों का उल्लेख विशेष रूप से तंत्र-मंत्र की प्राचीन विद्या में किया जाता है। यहां "६४ स्तंभ" का प्रतीक विभिन्न सिद्धियों और शक्तियों के रूप में होता है। हर स्तंभ को एक विशिष्ट सिद्धि या ऋद्धि से जोड़ा जाता है, जैसे ध्यान, तप, साधना, और विशेष प्रकार की मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ।

मुख्य स्तंभ
उसी के ऊपर में एक समुद्री जीव को अंकित किया गया है, जिसे 'ग्रासमुख' कहा जाता है, जो सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है। जिनालय में भूतल तथा प्रथम तल पर चतुर्मुखी द्वार हैं, उत्तर दिशा से जिनालय में प्रवेश होगा।

वागला
प्रत्येक दो इन्द्रों के बीच 'वागला' की आकृति दिखाई गई है, जो नकारात्मक ऊर्जा को जिनालय में प्रवेश नहीं करने देता है। स्तंभों पर आधारित इस जिनालय के भूतल पर ६४ स्तंभों का निर्माण किया गया है। सभी स्तंभ मिन्न- भिन्न प्रकार की नक्काशी से सुसज्जित हैं, जिनमें मुख्य रूप से वीतरागता की प्रतीक मुनि मुद्रा को दर्शाया गया है। भूतल में गंध कुटी के आधार के रूप में एक मुख्य स्तंभ का निर्माण किया गया है। ६४ चँवर झुलाते हुए इंद्र बनाए गए हैं।
दादरी-I पूर्व दिशा सीलिंग
प्रथम तल में जैसे ही प्रवेश करेंगे प्रवेश द्वार की सीलिंग में इन्द्रों की अलग-अलग स्वागत मुद्राएँ श्रीजी के दर्शनार्थियों का स्वागत करती प्रतीत होती है। चार द्वारों पर सोलह कारण भावना के प्रतीक के रूप में १६ स्तंभों का निर्माण किया गया है। मंडोवर में प्रथम पंक्ति में गज का बाल्य रूप अलग-अलग मुद्राओं में दिखाया गया है, जो नृत्य करते जिनालय के प्रथम तल के मध्य भूतल में स्थित मुख्य हुए जिनालय की ओर अग्रसर है। उसी के ऊपर हँस एवं मोर स्तंभ के ऊपर ही गंध कुटी का निर्माण किया जाएगा एवं गंध की मुद्रा दिखाई गई है।

मुख्य शिखर दादरी के गड़ाई एवं फिटिंग का कार्य
मंडोवर पर ही प्रत्येक दिशा में ६-६ झरोखे बनाए गए हैं। चारों दिशाओं में ऐसे कुल २४ झरोखे है। जिनमें अंदर का बाहर और बाहर का अंदर नजर नहीं आता है। मुख्य मंदिर के प्रथम तल के अंदर भी २४ स्तंभ का निर्माण किया गया है, जिन पर अलग-अलग नक्काशी एवं अलग-अलग मुद्राएँ अंकित की गई हैं। जैसे-इन्द्र-इंद्राणी, मंगल कलश आदि। स्तंभों के ऊपर मुख्य छतों का निर्माण किया गया है। इन छतों पर नक्काशी का एक अलग ही अद्भुत रूप दिखाया गया है।

दादरी-II पूर्व दिशा सीलिंग
हंस को विवेक का और मोर को कुटी में श्रीजी की पद्मासन में ४ प्रतिमाएँ विराजमान होगी, प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। हमारे महाराजश्री भी जिससे कि ऐसा प्रतीत होगा कि हम समवसरण में आ गए हैं कहते हैं- यदि मानव अपने जीवन में विवेक रखे और प्रत्येक और साक्षात श्रीजी की दिव्य ध्वनि सुन रहे हैं। यहाँ पर श्रीजी कार्य प्रसन्नता से करे तो उसके जीवन में सुख-शांति व विराजमान होंगे। इस मुख्य छत की कलाकृतियों में पूरे समृद्धि अपने आप ही आएगी। मानवीय गुणों को दर्शाया गया है।

उत्तर चौकी सीलिंग
जिनालय के प्रथम तल के मध्य भूतल में स्थित मुख्य स्तंभ के ऊपर ही गंध कुटी का निर्माण किया जाएगा एवं गंध कुटी में श्रीजी की पद्मासन में ४ प्रतिमाएँ विराजमान होगी, जिससे कि ऐसा प्रतीत होगा कि हम समवसरण में आ गए हैं और साक्षात श्रीजी की दिव्य ध्वनि सुन रहे हैं। यहाँ पर श्रीजी विराजमान होंगे। इस मुख्य छत की कलाकृतियों में पूरे मानवीय गुणों को दर्शाया गया है। यह मुख्य छत का एक छोटा सा हिस्सा है, जिससे मानव के वांछित गुणों की भावनात्मक परिणति के प्रतीकात्मक रूप को दर्शाती है।

